बालक यीशु - पूर्णतया मनुष्य पूर्णतया परमेश्वर

पिता परमेश्वर की प्रसन्नता का यह कारण था कि वह "किसका" था।


प्रस्तावना

"और बालक बढ़ता, और बलवन्त होता, और बुद्धि से परिपूर्ण होता गया; और परमेश्‍वर का अनुग्रह उस पर था।"

– लूका २:४०

"जितने उसकी सुन रहे थे, वे सब उसकी समझ और उसके उत्तरों से चकित थे।"

– लूका २:४७

"और जब वह जल से निकलकर ऊपर आया, तो तुरन्त उसने आकाश को खुलते और आत्मा को कबूतर के समान अपने ऊपर उतरते देखा। और यह आकाशवाणी हुई, "तू मेरा प्रिय पुत्र है, तुझ से मैं प्रसन्न हूँ।""

– मरकुस १:१०–११

"बालक यीशु पूरे डील-डौल और ज्ञान में बढ़ता गया। यहाँ तक कि इब्री शिक्षक भी परमेश्वर की बातों के विषय में उसके ज्ञान से चकित थे। जब भी यीशु परमेश्वर के विषय बातें करता था तो वह उसे पिता कहकर संबोधित करता था। परमेश्वर का अनुग्रह यीशु पर था और जो भी उसे जानते थे उनकी कृपा उस पर होती थी।"

– आशा, अध्याय ८

"जब यीशु पानी से बाहर आया तो परमेश्वर का आत्मा उस पर उतर आया और यह आकाशवाणी हुई, "यह मेरा प्रिय पुत्र है जिससे मैं अति प्रसन्न हूँ।"

– आशा, अध्याय ८

ध्यान से देखें और विचार करें

एक बालक और एक युवक के रूप में यीशु के बारे में अधिक कुछ ज्ञात नहीं है। उसके जन्म और लोगों के मध्य उसकी सेवकाई आरंभ होने के बीच ३० वर्ष बीते थे और उन वर्षों के बारे में में बाइबल अधिक कुछ नहीं बताती। परमेश्वर का पुत्र होने के रूप में वह अन्य लोगों से भिन्न था। मरियम का पुत्र होने के रूप में, वह हर उस व्यक्ति के समान था जो कभी जीवित रहा हो। परमेश्वर होकर मनुष्य के स्वरूप में बड़े होना कैसा लगाता होगा? हमारे पास ऐसे कई प्रश्न हैं जिनके उत्तर स्पष्ट नहीं हैं।

संपूर्ण ब्रह्मांड का रचयिता होकर भी सृष्टि पर उसी प्रकार निर्भर होना, जिस प्रकार कोई भी नन्हा बालक अपने शैशव में लालन-पालन के लिए निर्भर होता है, तब कैसा लगता होगा? उसके मुँह से निकले पहले शब्द क्या थे? क्या कभी ऐसा समय भी आया था जब दूसरे बच्चे खेल-खेल में अपने गुट बना  लेते थे और वह अकेला रह  जाता था? तब उसे कैसा लगा होगा? चेहरे पर मुँहासे और किशोरावस्था के उन नाजुक वर्षों में क्या उसे भी कुछ अजीब-सा लगा होगा? क्या कभी कोई किशोरी रही होगी जिसे यीशु प्यारा लगा होगा? वह उस स्थिति से कैसे निपटा होगा? क्या कभी किसी ने उस पर धौंस जमाकर उसे डराने का प्रयास किया होगा? वह उस से कैसे निपटा होगा?

किसी तरह, उन वर्षों की बातों पर ध्यान न देना, उन्हें अनदेखा कर आगे बढ़ जाना, हमारे लिए आसान होगा, किंतु यीशु तो उन वर्षों को अनदेखा कर आगे नहीं बढ़ा। उसने उनका अनुभव किया है, और भरपुरी से अनुभव किया है। उपर्युक्त पदों से हम देखते हैं कि, कुछ विशिष्ट बातें हैं जो हम परमेश्वर के पुत्र के बारे में जान सकते हैं जब वह बड़ा हो रहा था और जब वह एक वयस्क पुरुष बना।

हम जानते हैं कि जब वह बालक ही था, तब भी यीशु मसीह को अपने स्वर्गीय पिता की वस्तुओं की प्यास थी। लूका  2:47 में वर्णित उपर्युक्त पदों में बताई गई घटना मंदिर में घटी थी। यूसुफ और मरियम यीशु को फसह मनाने के लिए यरूशलेम ले गए थे, जो एक ऐसा पर्व था जो उस  बलिदान का पूर्वसंकेत था जिसे यीशु अंततः पाप और मृत्यु पर विजय प्राप्त करने के लिए देने वाला था। किसी तरह बालक यीशु अपने माता-पिता से बिछड़ गया। तीन दिनों के बाद उसके माता-पिता ने आखिरकार उसे मंदिर में उस समय के धार्मिक अगुवों के साथ बातचीत करते हुए पाया। बाइबल कहती है कि लोग “उसकी समझ और उसके उत्तरों से चकित” थे। और जब उसकी माता ने उसे, उन्हें चिंता में डालने के लिए डाँटा, तो यीशु ने उत्तर दिया, "तुम ...क्या नहीं जानते थे कि मुझे अपने पिता के भवन में होना अवश्य है?"  (लूका  2:49).

मंदिर में हुई घटना से लेकर, उपर्युक्त पद मरकुस  वर्णित यीशु के बपतिस्मे तक लगभग १८ वर्ष वर्ष गुमनामी में गुज़रे मरकुस 1:10| यीशु के बपतिस्मे के बारे में  विस्तारपूर्वक अध्ययन हम अगले पाठ में करेंगे, किन्तु अभी के लिए, यीशु के स्वर्गीय पिता के उन वचनों पर विशेष ध्यान दें, जो उसने तब कहे जब यह यीशु पानी से बाहर निकला,: "तू मेरा प्रिय पुत्र है, तुझ से मैं प्रसन्न हूँ।"

इस तथ्य पर ध्यान देने से न चूकें कि ये वचन यीशु की तीन वर्षों की उस सेवकाई के आरंभ होने से पहले ही बोल दिए गए थे जिसने इतिहास को सदा के लिए बदल दिया। ये वचन पहले ही बोल दिए गए थे;  इससे पहले कि वह एक भी उपदेश का प्रचार करता; इससे पहले कि वह एक भी आश्चर्यकर्म करता और इससे भी पहले कि वह पाप और मृत्यु पर विजय पाने के लिए और मनुष्य का परमेश्वर से मेल मिलाप कराने के लिए सबसे महत्वपूर्ण कार्य को पूर्ण करता। फिर भी,  उसका स्वर्गीय पिता ने उससे यह कह सकता था कि वह उससे अति प्रसन्न है!

परमेश्वर पिता प्रसन्न था, उन कार्यों के लिए इतना अधिक नहीं है जो यीशु ने पूर्ण किए, बल्कि वह स्वयं जो था, उसके लिए... या यह कहना अधिक उचित होगा कि, वह किसका था, उसके लिए! जो व्यक्ति यह मानते हैं कि परमेश्वर उनके कार्यों के आधार पर उनसे प्रेम करता है और उन्हें अपनाता है, उन व्यक्तियों के लिए यह बात थोड़े में ही अधिक बोलती है।

पूछें और मनन करें

  • क्या आपको बदलती हुई आवाज़ और चेहरे पर नए-नए निकले मुहाँसों वाले एक किशोर के रूप में यीशु की कल्पना करना थोड़ा-सा असहज लगता है? क्यों या क्यों नहीं? इस बारे में अपनी भावना व्यक्त करें।
  • क्या आपके लिए यह विचार नया है कि बाइबिल में दर्ज़, यीशु द्वारा आश्चर्यजनक और महत्वपूर्ण कार्य किए जाने के पहले से ही परमेश्वर पिता उससे प्रसन्न था? क्या आपको लगता है कि परमेश्वर आपसे प्रसन्न है या नहीं, आपके कार्य-प्रदर्शन पर निर्भर करता है? क्यों या क्यों नहीं?
  • क्या प्रदर्शन और आज्ञाकारिता में कोई अंतर है? समझाना। क्या आप स्वीकृति और स्वीकृति के बीच अंतर देखते हैं? समझाना।

निर्णय लें और करें

बाद में, अपने व्यस्त जीवन में यीशु ने एक सेवक की कहानी सुनाई जो अपने स्वामी द्वारा सौंपी गई उस संपत्ति को निवेश कर दुगना करने में विश्‍वासयोग्य रहा था, जो उसका स्वामी परदेश जाते समय उसे देकर गया था। वापस घर लौटने पर उसके स्वामी ने उससे कहा, ‘धन्य, हे अच्छे और विश्‍वासयोग्य दास, तू थोड़े में विश्‍वासयोग्य रहा; मैं तुझे बहुत वस्तुओं का अधिकारी बनाऊँगा।"1

इस कहानी में, सेवक का कार्य-प्रदर्शन मायने रखता है। स्वामी के घर लौटने पर वह कार्य-प्रदर्शन स्वामी के अनुमोदन का आधार था। इस दृष्टांत में बताए गए स्वामी के समान, परमेश्वर द्वारा हमारे लिए "धन्य" कहना इस बात पर आधारित होता है कि हमने क्या किया है... या यह कहना अधिक उचित होगा कि हमने, विश्वासयोग्यता के साथ उसकी आज्ञा का पालन करते हुए, हमारे माध्यम से परमेश्वर को क्या करने दिया है। 

फिर भी, जैसा कि हमने आज के पाठ में देखा है, हमारे लिए परमेश्वर का प्रेम इस पर आधारित नहीं है कि हम उसके लिए क्या करते हैं, बल्कि इस पर आधारित है कि हम कौन हैं ... या यह कहना अधिक उचित होगा कि, हम किसके हैं। यदि आप उसके हैं, तो इस सत्य में  शांति पाएँ कि परमेश्वर आपसे प्रेम करता है और आपसे प्रसन्न है क्योंकि आप उसके हैं। यदि आप यह सुनिश्चित नहीं कर पा रहे हैं कि आप उसके हैं या नहीं तो तुरंत इस मार्गदर्शिका के अंत में दिए गए 'परमेश्वर को  जानना' खंड में जाएँ और इस समस्या का समाधान करें...सदा के लिए! 

जबकि परमेश्वर की स्वीकृति इस बात पर आधारित है कि हम क्या करते हैं, उसकी स्वीकृति इस पर आधारित है कि यीशु ने क्रूस पर हमारे लिए क्या किया है।    

अधिक अध्ययन के लिए पढ़ें

निम्नलिखित संसाधन परमेश्वर के अनुमोदन और कार्य-प्रदर्शन पर आधारित स्वीकृति के मुद्दे को संबोधित करते हैं:

Footnotes

1Matthew 25:14-28

Scripture quotations taken from the NASB