लज्जा और दोषारोपण - पाप का फल

पीड़ित होने की मानसिकता – एक दुष्चक्र


प्रस्तावना

आदम और हव्वा ने फल खाने से पहले, - "और आदम और उसकी पत्नी दोनो नग्न थे, पर लजाते न थे।"

– उत्पत्ति २:२५

फिर - "तब उन दोनों की आँखें खुल गईं, और उनको मालूम हुआ कि वे नंगे हैं; इसलिए उन्होंने अंजीर के पत्ते जोड़ जोड़ कर लंगोट बना लिये। तब यहोवा परमेश्‍वर, जो दिन के ठंडे समय वाटिका में फिरता था, का शब्द उनको सुनाई दिया। तब आदम और उसकी पत्नी वाटिका के वृक्षों के बीच यहोवा परमेश्‍वर से छिप गए। तब यहोवा परमेश्‍वर ने पुकारकर आदम से पूछा, “तू कहाँ है?” उसने कहा, “मैं तेरा शब्द बारी में सुनकर डर गया, क्योंकि मैं नंगा था; इसलिये छिप गया।” उसने कहा, “किसने तुझे बताया कि तू नंगा है? जिस वृक्ष का फल खाने को मैं ने तुझे मना किया था, क्या तू ने उसका फल खाया है?” आदम ने कहा, “जिस स्त्री को तू ने मेरे संग रहने को दिया है उसी ने उस वृक्ष का फल मुझे दिया, और मैं ने खाया।” तब यहोवा परमेश्‍वर ने स्त्री से कहा, “तू ने यह क्या किया है?” स्त्री ने कहा, “सर्प ने मुझे बहका दिया, तब मैं ने खाया।”

– उत्पत्ति ३:७-१३ 

"हव्वा ने उसकी बात सुनी और परमेश्वर पर संदेह करने लगी। उसने फल लिया और खाया। फिर उसने वह फल आदम को दिया और उसने भी खाया। और तुरंत ही उन्हें अपनी नग्नता का बोध हुआ और वे लज्जित हुए। कुछ भयंकर घट चूका था। कुछ बदल चूका था।... आदम और हव्वा ने परमेश्वर से छिपने की कोशिश की, और लज्जा से बचने के लिए उन्होंने स्वयं को पत्तों से ढांपा। परन्तु ऐसा करना काम नहीं आया, क्योंकि उनकी समस्या बाहरी नहीं बल्कि  भीतरी थी। लज्जा पाप का फल था और पाप उनमें कार्य कर रहा था - एक विष के समान।"

– “आशा” अध्याय ३ 

ध्यान से देखें और विचार करें

इस बात का कोई संकेत नहीं मिलता है कि वर्जित फल खाने से पहले आदम और हव्वा ने कभी लज्जा 1 को जाना था (उत्पत्ति 2:25). परमेश्वर की अवज्ञा करने के पश्चात उन्हें अपनी नग्नता का बोध हुआ और पहली बार उन्होंने स्वयं को उघाड़ा हुआ और असुरक्षित महसूस किया। इसलिए उन्होंने स्वयं को ढकने का प्रयास किया। फिर उन्होंने स्वयं को परमेश्वर से छिपाने का प्रयास किया। क्यों? क्योंकि वे डरे हुए थे। हो सकता है कि वे परमेश्वर की प्रतिक्रिया से डर रहे हों, लेकिन वास्तव में वे स्वयं को उस एकमात्र परमेश्वर से छिपा रहे थे जो सच में उनकी सहायता कर सकता था, वही एकमात्र परमेश्वर जिसकी उन्हें सबसे अधिक आवश्यकता थी।

यह बहुत रोचक है कि परमेश्वर ने पूछा, "तू कहाँ है?" परमेश्वर सर्वज्ञ है, वह सब जानता है। वह जानता था कि आदम और हव्वा कहाँ छिपे थे। लेकिन उसका प्रश्न बस ऊपरी तौर से पूछने के लिए नहीं था। परमेश्वर आदम और हव्वा को उनके पाप के परिणाम के सम्मुख ला रहा था। यदि इस प्रश्न "तू कहाँ है?" को उनकी भौतिक स्थिति से अधिक उनकी आत्मिक स्थिति पर लागू करें, तो जानेंगे कि इसका अर्थ बहुत ही गहरा है। वे बहुत ही आशाहीन स्थिति में थे और परमेश्वर का प्रश्न जैसे उन्हें आइना दिखा रहा था। उन्हें अपनी स्थिति की गंभीरता को पहचानने की आवश्यकता थी।

इस बात पर ध्यान दें कि आगे क्या होता है, जब वे "मिल" जाते हैं। आदम हव्वा को दोषी ठहराता है और हव्वा शैतान को। लज्जा पाप के पहले फलों में से एक थी, और दोषारोपण उसका प्रत्यक्ष परिणाम था।

पूछें और मनन करें

जैसा कि आदम और हव्वा के साथ हुआ था, लज्जा हमें भी किसी समस्या का ईमानदारी से सामना करने और उसे सुलझाने के लिए सहायता लेने से रोक सकती है। लज्जा किसी भी व्यक्ति को पीछे हटने, यहाँ तक की स्वयं को छिपा लेने के लिए बाध्य कर सकती है, जिससे स्थिति और बदतर बन जाती है। और इसके बाद अक्सर दोषारोपण किया जाता है: "यह उसकी गलती है कि मैं इस स्थिति में हूँ।" इसे एक पीड़ित की मानसिकता कहा जाता है। ऐसी सोच का खतरा यह होता है कि यह उस स्थिति में आने की या फिर उस स्थिति से बाहर न निकल पाने की व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी न उठाने का एक बहाना बन जाता है। एक "पीड़ित" अक्सर  यही मानता है कि स्थिति नहीं बदल सकती है।

अनियंत्रित लज्जा और दोषारोपण एक दुष्चक्र बन सकता है। और इस चक्र का आरंभ घर या कार्यस्थल में घटी छोटी-मोटी घटनाओं जैसी छोटी- छोटी बातों से या फिर किसी व्यसन या टूटे रिश्ते जैसे जीवन के बड़े संघर्षों से हो सकता है। एक बार आरंभ होने के बाद यह चक्र तब तक चलता रहता है जब तक कोई बात या कोई व्यक्ति हमें इसकी वास्तविकता नहीं दिखाता, और हमें इस प्रश्न के सम्मुख नहीं लाता है कि "तू कहाँ है?" और फिर हमें एहसास होता है कि यदि हम उसी जगह पर बने रहते हैं तो वह इसलिए नहीं कि हम पीड़ित हैं बल्कि इसलिए क्योंकि हम ऐसा करना चुन रहे होते हैं। 

शायद आपको स्वयं से निम्नलिखित प्रश्न करने के लिए समय निकालना चाहिए। इस से भी बढ़कर, इन प्रश्नों के संबंध में परमेश्वर को आप से पूछने दे, "तू कहाँ है?"

  • क्या मैं लज्जित हूँ? कारण क्या है? (चाहे छोटी ही हो, अधिकांश लोगों ने जीवन में कभी न कभी लज्जा का अनुभव किया है और यदि  लज्जा है तो इसका मतलब है कि कहीं न कहीं कोई समस्या दबी हुई है जिसे सुलझाया नहीं गया है। एक अधूरा वादा, एक सफेद झूठ जैसे छोटी-छोटी बातें भी लज्जा उत्पन्न कर सकती हैं।)
  • क्या मैं लज्जा के कारण किसी बात या किसी व्यक्ति से पीछे हट रहा हूँ या उससे बचने की कोशिश कर रहा हूँ?
  • क्या मैं अपने जीवन में किसी बात के लिए किसी व्यक्ति को दोष दे रहा हूँ जबकि अपने कार्यों की ज़िम्मेदारी मुझे स्वयं उठानी चाहिए? कभी-कभी लोग कठिन परिस्थितियों के लिए, यहाँ तक कि, परमेश्वर को भी दोष देते हैं (जैसे- "मेरे तो भाग्य में ही बस यही लिखा है"), जबकि वास्तव में परमेश्वर आपको सच में एक बेहतर स्थान पर ले जाना चाहता है।

निर्णय लें और करें

आज के विषय को समझना थोड़ा कठिन हो सकता है। लेकिन कृपया इस बात को समझने का प्रयास करें कि इस सामग्री के लेखक लज्जा के विषय में ये बातें नहीं लिखते यदि उन्हें इस बात का गहरा विश्वास नहीं होता कि परमेश्वर के पास इस समस्या का पूर्ण और परम उत्तर है। सच तो यह है कि आदम और हव्वा के लिए जो सत्य था वही आज हमारे लिए भी सत्य है। एकमात्र परमेश्वर ही लज्जा की समस्या का समाधान करने में सक्षम है।

यदि आपने इस अध्याय के अंत के खंडों को पढ़ा है तो आप जानते हैं कि परमेश्वर ने लज्जा के मूल कारण 'पाप' को यीशु के क्रूस पर पूर्णतया पराजित कर दिया है। लज्जा एक समस्या हो सकती है, उन लोगों के लिए जो परमेश्वर का अनुसरण कर रहे हैं और साथ ही उन लोगों के लिए भी जिन्होंने अभी तक उसे जाना नहीं है। चाहे आपकी स्थिति जो हो, यदि आप लज्जा की समस्या से जूझ रहे हैं तो परमेश्वर के साथ संगति न छोड़ें। इस अध्याय के अंत के खंड पर जाएँ और परमेश्वर को आपके साथ संगति करने का अवसर दें।

अधिक से अध्ययन के लिए पढ़ें :

  • Shame from a Biblical Perspective (InterVarsity Christian Fellowship/USA, 2006). Retrieved October 5, 2006.
  • Life Recovery Bible, New Living Translation. According to the Amazon.com blurb, “Designed for both the Christian who is seeking God’s view on recovery and the non–Christian who is seeking God and answers to recovery, the Life Recovery Bible will lead readers to the source of true healing–God himself. The features of this best–selling Bible were brought together by two of today’s leading recovery experts, David Stoop, Ph.D., and Stephen Arterburn, M.Ed.” (http://www.amazon.ca/Life–Recovery–Bible–Nlt–David–Stoop/dp/084233341X). Retrieved October 5, 2006.
  • Bruce Thomas, The Gospel for Shame Cultures: A Paradigm Shift. For further reading in more depth on this area of shame and the gospel, this article appeared in the July 1994 Evangelical Missions Quarterly. (http://www.internetevangelismday.com/shame-cultures.php). Retrieved October 5, 2006.

Footnotes

1Shame [Definition]. (© Merriam–Webster Online Dictionary, 2006). (http://www.merriam-webster.com/dictionary/shame).
Retrieved October 19, 2006.

Scripture quotations taken from the NASB